पर्यावरण प्रेमी

किसी को पर्यावरण की चिंता ही नहीं है, ये कहते हुए उसने चाय की कुल्हड़ सड़क पर फेंका और चला गया। 

हम इंसान अपनी गलतियों का ठीकरा दूसरे के सर फोड़ कर अपने कर्तव्यों से छुटकारा पाना चाहते है। 5 जून आते ही देश भर में भिन्न भिन्न तरह के पर्यावरण प्रेमी का जन्म होता है, जिसमें से अधिकतर लोगों को इस बात की चिंता होती है कि पेड़ों की संख्या कम हो गयी है जिससे गर्मी का प्रभाव बढ़ा है जबकि कुछ लोग सोचते हैं कि दुनिया से पीने योग्य पानी ख़त्म हो जाएगा तो ज़िन्दगी कैसे संभव होगा। नहीं जानते है ऐसे लोग कि ये सब क़ुदरत की मर्ज़ी है और हमारे ही अव्यवस्थित कामों का परिणाम। 

आमतौर से यही देखा जाता है कि हम उन्हीं चीजों को संरक्षित करने के लिए चिंतित होते है जो हम इंसानों के बस का नहीं है। कुछ लोग ये मानते होंगे कि इंसान ऐसा कर सकता है लेकिन मेरा ऐसा मानना बिल्कुल भी नहीं है अगर ऐसा कर पाना संभव होता हो आज गंगा का पानी पीने योग्य होता, यमुना अपने निर्मलता को लिए खिलखिलाती और बहुत सारी नदियाँ अपने अस्तित्व की जंग नहीं लड़ रही होती।

आज दुनिया को पर्यावरण प्रदूषण का सबसे ज्यादा ख़तरा किसी चीज़ से है, तो वह है इंसान की अपनी सोच। आज हम अपने घर से निकलने वाला कूड़ा पड़ोसी के घर के सामने फेंक देते है जबकि उसका सुनियोजित जगह चंद कदम की दूरी पर ही होता है। भारत में चाय के प्रेमियों की संख्या इतनी है कि जिसे गिना भी नहीं जा सकता ये लोग चाय पीने के बाद कुल्हड़ के साथ क्या करते है ये आपने पहले लाइन में ही पढ़ लिया है।

अब बात करते है ऐसे पर्यावरण प्रेमी की जो 10 रुपये का चिप्स की पैकेट खरीदने पर भी दुकानदार से पॉलीथीन का एक थैला मांगते हैं वो भी उस परिस्थिति में जब पर्यावरण को पेड़ कटने से ज्यादा ख़तरा इन प्लास्टिक के कचरों से हो।

हम नदियों में पानी नहीं भर सकते हैं, हम शहरों में बहुत ज़्यादा पेड़ नहीं लगा सकते हैं, हम शहरों के जल स्तर को नीचा होने से नहीं रोक सकते है ये सब एक ऐसा सत्य है जिससे हम नज़रें तो चुरा सकते हैं लेकिन हम इसे झुटला नहीं सकते इसलिए हमें वो करना चाहिए जो हमारे बस में हो जिसके लिए हमें बस अपना कुछ मिनट ही देना है जैसे कूड़े को उसके सही स्थान पर रखे, बिना वजह पानी की बर्बादी न करे,प्लास्टिक का इस्तेमाल जितना हो सके ना करें। जहां तक हो पर्यावरण को संरक्षित रखें ,और लोगों को अधिक से जागरूक करे 

दुनिया भर में हर साल एक लाख वर्गकिलोमीटर क्षेत्रफल में जंगल काटे जा रहे हैं पृथ्वी की 1/3 भूभाग को कवर करती है जो जानवरों पेड़ पौधों और कीड़ों की 80%से अधिक स्थली प्रजाति का घर है दुनिया के आधे से अधिक वन सिर्फ 5 देशों में पाए जाते हैं 25%दवा वन से मिलती हैं फिर भी लोग इसकों अपने इस्तेमाल के लिए प्रयोग कर रहें हैं ।

हम अकेले तो पूरे संसार में बदलाव नहीं ला सकते हैं लेकिन हम अकेले खुद में ज़रूर बदलाव ला सकते हैं इसलिये शुरुआत कहीं और से हो इससे अच्छा है कि शुरुआत हमसे हो आपसे हो... तभी एक शायर कहते हैं ।

               बड़ी मासूम सी हैं ये ज़िन्दगी मेरी 

               शहर मे रहूँ और गांव भी चाहिए  ,

              बस बैठा रहूँ ऊंची इमारतों में मैं 

             पेड़ को काटूं और छांव भी चाहिए ।


___धन्यवाद  ✍️

Comments

  1. पेड़ लगाए अवश्य जाते है लेकिन उन्हें काटकर पैसा कमाने के लिए...

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    1. लोग अपने स्वार्थ के लिए सब कुछ कर सकते हैं

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