मदर्स-डे (8 मई)

माँ/माता/माई/मम्मी/मॉम/अम्मा/अम्मी कुछ भी कह लीजिए, ज़ेहन में सिर्फ और सिर्फ एक फ़रिश्ते सा चेहरा उभर कर ही आता है, फ़रिश्ता लफ्ज़ भी उस अज़ीम हस्ती के लिए एक छोटा लफ्ज़ होगा, "माँ के कदमों के नीचे जन्नत है।" ऐसा भी लिखा हैं कहीं ।

 जब एक बेटा या बेटी का जन्म होता है तो केवल एक बेटा या बेटी का ही जन्म नहीं होता है बल्कि उसके साथ-साथ एक माँ भी जन्म लेती है। दुनिया भर के दुःख दर्द को झेल कर, तकलीफों को उम्मीद के दामन से कई बार झटकती है तब कहीं जाकर एक बेटा या बेटी जन्म लेती है, तब वो नन्ही कली/वो घर का दीपक इस विचित्र दुनिया का नज़ारा कर पाता/पाती है।

बचपन में मैंने एक कहानी पढ़ा था, कहानी क्या वो इतिहास की घटना थी जिसमें एक शिकारी शिकार के लिए जंगल जाता है बहुत तलाश के बाद उसे एक हिरणी और उसका बच्चा दिखाई देता है शिकारी अपने घोड़े को दौड़ता है हिरणी तो उस शिकारी के गिरफ्त से खुद को बचा लेती है लेकिन उसका बच्चा शिकारी के पकड़ में आ जाता हैं जब शिकारी उस बच्चे को लेकर शहर की तरफ चलता है, तो हिरणी बच्चे की मोहब्बत में खुद-ब-खुद उस शिकारी के पीछे-पीछे चली आती है। उस हिरणी की ममता का ये आलम देखकर शिकारी को उन दोनों पर रहम आ जाता है और वो दोनों को छोड़कर कर वापस शहर की तरफ चला जाता है। वो हिरणी उस शिकारी को दुआ देती है, जिसकी दुआ का असर ये होता है कि उस शिकारी को चंद रोज़ बाद ही बादशाहत मिल जाती है। ये एक हिरणी की दुआ का असर नहीं बल्कि एक माँ की दुआ का असर था जिसने एक मामूली शिकरी को बादशाह बना दिया। माँ की दुवाओं में बहुत असर होता है किसी शायर ने कहा है...

                           ये जो माँ की दुआ होती है
                         ये सब दुवाओं की माँ होती है

 आज मदर्स डे है, कि बहुत से बेटे-बेटियाँ अपने घर से दूर अपने माँ बाप से दूर कहीं ज़िन्दगी से संघर्ष कर रहे होंगे। उनकी तो ख़ैर मज़बूरी है बेबस हैं बेचारे...लेकिन आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने माँ से (किसी झगड़े को लेकर, किसी कहा सुनी को लेकर या किसी दूसरे वजह से) अपनी दुनिया अलग कर बैठे हैं, यकीन जाने कि वो माँ तो अपने औलादों को दुआएं दे रही होगी लेकिन औलाद का दिन का सुकून और रात की नींद उनके बस में नहीं होगा लेकिन इस बात का भी एहसास तभी होगा जब औलाद के अंदर की ज़मीर ज़िंदा हो, इंसानियत क़ायम हो। अगर मेरी बात किसी को गलत लगे तो वो अपने शहर के किसी वृद्धा आश्रम में जा कर देख सकते है। आपको बहुत माँ ऐसी मिलेंगी अफ़सोस कि जिनको कोई पूछने वाला/वाली नहीं है...।

मेरा सवाल उन लोगों से भी है जो आज के दिन(मदर्स डे) अपनी माँ के साथ एक तस्वीर लेकर #HAPPY MOTHER'S DAY के साथ सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते है, क्या इतना ही है उस जन्म देने वाली माँ के प्रति आपका कर्तव्य ? इतने से ही उसके सारे जीवन की जमा पूंजी ? क्या इतना ही मोहब्बत है आपको आपके माँ से ? सोचने वाली बात है सोचिएगा ज़रूर...

माँ एक ऐसे समुन्द्र समान है किसका पानी हमें ज़रूरत के हिसाब से मीठा और खारा दोनों मिलता है इस समुन्द्र का रूप तो हम देख सकते हैं लेकिन इसके मन की गहराई और निर्मलता कभी नहीं नाप सकते। जिसके बारे में लिखते लिखते सुबह से शाम हो जाये फिर भी बात ना मुक़म्मल ही रहेगी। सैकड़ों शेर माँ पर लिखने के बाद खुद मुनव्वर राणा साहब कहते है कि ये तो माँ के उस एक कतरे आँसू के बराबर भी नहीं है जो अपने लाडले या लाडली को इस दुनिया में लाने के वक़्त आँख से निकलता है।

मैं अपने इस लेख के ज़रिये से आप लोगों से ये अपील करता हूँ कि ये सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से अच्छा है कि आज के दिन आप अपने आप से ये वादा करें कि आज से मैं कोई ऐसा काम नहीं करूँगा/करूँगी जिससे मेरी माँ नाराज़ हो क्योंकि जिससे माँ नाराज़ उससे रब नाराज़, जिससे रब नाराज़ उससे सब नाराज़...
सिर्फ सोशल मीडिया और किसी खास दिन(मदर्स डे) माँ से अपनी मोहब्बत का दिखावा करने वालों के लिए मुनव्वर राणा साहब का एक शेर है कि...

        ‏             ऐसे तो उससे मोहब्बत में कमी होती है,
                    माँ का एक दिन नहीं होता है सदी होती है।  

___धन्यवाद 🙏 


Comments

  1. मां के जैसा नि:स्वार्थ प्रेम अन्य कोई स्त्री नहीं कर सकती है!

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